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लीक से हटकर
























गजल

सुरेश शर्मा


हैरान हूँ अजीब ये व्यवहार देखकर ।

कुल्हाड़ियों का जंगलों पे प्यार देखकर ।।


लू भरे इन अंधड़ों से डर गया था जो ।

क्यों हंस रहा है रेत का विस्तार देखकर ।।


वो घरों में क्यों न लगायेंगे मंडिया ।

रिश्तों के बीच सज गया बाज़ार देखकर ।।


मैं उगाऊं किस तरह संवाद की फसल ।

सेतु के नाम पर उठी दीवार देखकर ।।


सत्य की आँखों में क्यों बादल-से भर गए ।

झूंठ की गगन चढ़ी मीनार देखकर ।।


द्वार बंद कब तक रखोगे आप सब ।

आदमी को इस कदर लाचार देखकर ।।



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