कविता             कहानी              लेख              अन्य रचनाएँ

लीक से हटकर




















गजल

सुरेश शर्मा


सर-सर कर फर-फर कर आईं पुरवईया ।।

हहराते पेड़ो ने गायीं रुबाइयाँ ।।


आया जब आज नहीं सूरज का अध्यापक ।

झूम-झूम बच्चों सी नाचीं अमराइयाँ ।।


पानी में नाच रहीं बूंदों की गुड़ियाएँ ।

दो- छत्ती रैलो-सी चलती ग़िज़ाइयाँ ।।


टापू के पेड़ो पर बगुलों के घोसलें ।

कीकर पे हिलती बयाँ की अट्टालिया ।।


पीलक की बंसी धुन चातक का शोर भी ।

सरकंडों से उठती मीठी किलकारियाँ ।।


आगे >