कविता             कहानी              लेख              अन्य रचनाएँ

लीक से हटकर









































































मक्खियां

वीरेन्द्र कुमार



बैल गुड़ की गाड़ी ले जा रहे हैं

और उन पर मक्खियां

पूरे जोर से भिनभिना रही हैं


देखो हमने कैसे साधन किए

कि इन बैलों को पाला-पोसा

कैसा तगड़ा किया

कि गाड़ी खींच रहे हैं

देखो हमने कैसे साधन किए

किसान को कर्ज दिया

खाद दी बीज दिया

कि गन्ने की खूब फसल हुई


देखो हमने कैसे साधन किए

किसानों को डीजल दिया

कोल्हू दिया किराए पर और बिजली दी

और उसने गुड़ बनाया


देखो देखो अब वह मंडी जा रहा है

गुड़ बेचने

ओ देखो हमने मंडी बनाई

गुड़ खरीद का न्यूनतम मूल्य तय किया


और उस व्यापारी से

जो गुड़ खरीदेगा

हमारा कोई रिश्ता नहीं

नहीं किया हमने गुड़ का मूल्य तय उसके कहने पर


देखो देखो हम हर किसान की

पांच साल में आमदनी

दुगनी कर देंगे

पांच साल बाद के मूल्यों पर 


देखो देखो इस बात में कोई खोट नहीं है

और हर विकासशील देश में

महंगाई तो बढ़ती ही है


पर दुगनी हो जाएगी आमदनी

किसान की चाहे अभी वह हो

पिद्दी की भी पिद्दी हम सच कहती हैं


हमने नहीं खाई कोई कमीशन

सब्सिडी में खाद की

जो दी गई मिल मालिकों को


हम सच कहती हैं

हमारे बैंक मैनेजर भी

बिल्कुल सच्चे हैं

उन्होंने नहीं खाई कोई कमीशन

कर्ज देने में में किसान को


हम सच कहती हैं

बीज कंपनी ने भी

नहीं दिया कोई चंदा

चुनाव में हमारे


हम हितेषी हैं सच्ची तुम्हारी

बाकी यह सब नासपीटे


देखो देखो हमारा चमत्कार

हमारा प्रताप

यह देखो हमें पहचान लो

हम ही हैं तुम्हारी मक्खी

बाकी सत्यानाशी है सब मक्खियां

हमें ही वोट देना ।