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लीक से हटकर
























































































गर्दभ चालीसा

डा.आर.एल. राव राज बुन्दॆली



दोहा :

जय जय गर्दभराज की,जय गदही के कन्त ।

बिगड़ी नाथ बिसारियो,हे खर भूषण सन्त ।।


चौपाई :

जय जय जय गदही के कंता ।। जय जय खर समाज के संता ।।

सकल धर्म हैं तुमको प्यारे ।। तुम्हरे किस्से सब से न्यारे ।।


प्राणी सरल मूक बन जीते ।। नहिं बदले तीनों युग बीते ।।

सीधा सच्चा चरित तुम्हारा ।। सबको लागे है अति प्यारा ।।


कितनें भोले बनकर रहते ।। भाँति भाँति के ताने सहते ।।

दम्भ द्वेष नहिं हॄदय तुम्हारे ।। उठ जाते हो नित भिनसारे ।।


ढेंच्यू ढेंच्यू नित उठ करते ।। उपमा मनुज तुम्हारी धरते ।।

हरी घास है तुम को भाती ।। खड़े खड़े की नींद सुहाती ।।


सदा एक सा रहता मुखड़ा ।। कभी न रोते सहते दुखड़ा ।।

मन्द मन्द जब दुम लहराते ।। खड़े कान हैं जिया लुभाते ।।


बोझ उठानें में तुम आगर ।। गड़ही तुम्हरा गंगा सागर ।।

क्रोध दम्भ नहीं तुम्हें सतावे ।। धोबी काका नित गुण गावे ।।


हिन्दू मुस्लिम तुम को पालें ।। तन पर कीचड़ खूब उछालें ।।

कीर्ति जगत भर तुमनें पाई ।। नहीं किसी पर आँख उठाई।।


तुमसे सबक मनुज है लेता ।। तुम्हरी उपमा खुद को देता ।।

तुमनें बुद्धि अलौकिक पाई ।। जय हो जय हो गर्दभ भाई ।।


बात बात में कहते चच्चा ।। निकला पूत गधे का बच्चा ।।

शांत चित्त हो खर कहलाते ।। नहीं किसी को खरी सुनाते ।।


सदा एक सी तुम्हरी रेखा ।। मुख चैतन्य नहीं हम देखा ।।

बरषा ठण्ड धूप सह लेते ।। हर अभाव में तुम रह लेते ।।


सादा जीवन उच्च बिचारा ।। तुमसे चलते बहु परिवारा ।।

दो अक्षर नहिं भले पढ़े हो ।। कर्मठता के शिखर चढ़े हो ।।


जय हो जय हो बोझाधारी ।। तुम पर कर्ज नहीं सरकारी ।।

धन दौलत की चाह नहीं है ।। मँहगाई की परवाह नहीं है ।।


जी.एस.टी से बाहर तुम हो ।। हर चैनल में तुम ही गम हो ।।

डी.जे.पर तुम कभी ठुमको ।। आरक्षण की चाह न तुमको ।।


खच्चर के तुम अर्ध बाप हो ।। सात सुरों में स्वर आलाप हो ।।

खाकर घास फूस अरु पत्ती ।। फिर भी हनते गज़ब दुलत्ती ।।


कबहूँ नहीं इलेक्शन लड़ते ।। जानबूझ नहिं पचडों पड़ते ।।

कभी नहीं अनशन को जाते ।। सदा शान्ति का पाठ पढ़ाते ।।


निज कुल को तुम रहे सहेजे ।। हम नें चुन - चुन संसद भेजे ।।

कलयुग में विश्वास पात्र हो ।। हमसे भी तुम बड़े छात्र हो ।।


सदा करूण रस डूबे रहते ।। हमसे ज्यादा दुःख तुम सहते ।।

दिल का दर्द नहीं दिखलाते ।। हर पीड़ा में जीना सिखलाते ।।


जय जय जय हो धूल रमैया ।। जय हो जय हो गदहा भैया ।।

तुम्हरी कला सभी से न्यारी ।। तुम पर कृपा करें नर नारी ।।


बेसर, धूसर, नाम तुम्हारे ।। चक्री-वाहन कबहुँ पुकारे ।।

जो जन करते तुम्हरी सेवा ।। उन के घर नित बरसे मेवा ।।


शिष्टाचार हिये अति भाया ।। चींटी तक को नहीं सताया ।।

सहन शक्ति के तुम रखवारे ।। धन्य भाग्य जहँ आप पधारे ।।


नित्य प्रातः दर्शन जे करिहैं ।। नाहिं क्षुधातुर कबहूँ मरिहैं ।।

पढे "राज" गर्दभ चालीसा ।। खूब हँसहिं काढ़हिं बत्तीसा ।।


दोहा :

हमको गर्दभ 'राज' से,मिलती सीख अपार ।

जन्म -मरण के बीच में,ढोना पड़ता भार ।।